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मीम्स, मैसेजेस और मतदान: सोशल मीडिया का राजनीतिक रंग

“डिजिटल दंगल: राजनीतिक विचारों को आकार देने में सोशल मीडिया की भूमिका”

आजकल के युवाओं में राजनीतिक ‘ज्ञान’ की बाढ़ आ गई है, और इसके पीछे का श्रेय जाता है हमारे अपने, सबके प्यारे सोशल मीडिया को। जी हां, वही सोशल मीडिया जो कभी हमें दोस्तों की शादी की तस्वीरें दिखाता था, अब राजनीतिक ‘महाभारत’ का अखाड़ा बन चुका है। चुनावी मौसम में तो यहां ‘डिजिटल दंगल’ शुरू हो जाता है, जहां हर कोई अपने राजनीतिक ‘ज्ञान’ के घोड़े दौड़ाता नजर आता है।

इस अखाड़े में युवा पीढ़ी अपने विचार ऐसे व्यक्त करती है, मानो उन्हें राजनीति की डिग्री ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ से मिली हो। फेसबुक पर लंबे-लंबे पोस्ट, ट्विटर पर तीखे व्यंग्य, और इंस्टाग्राम पर स्टोरीज़ के माध्यम से राजनीतिक ‘प्रवचन’ देना तो जैसे इनका शगल बन चुका है।

अब, चाहे वह चाय की दुकान हो या ट्विटर का ट्रेंडिंग पेज, हर जगह ये डिजिटल योद्धा अपनी-अपनी तलवारें भांजते नजर आते हैं। किसी को लगता है कि उनके ‘ट्वीट’ से सरकार बदल जाएगी, तो किसी को यकीन है कि उनकी ‘इंस्टा स्टोरी’ से समाज में क्रांति आ जाएगी।

इस ‘डिजिटल दंगल’ में असली मुद्दे तो कहीं पीछे छूट जाते हैं, और हमें मिलता है एक अंतहीन

वाद-विवाद का सिलसिला जो न तो किसी निष्कर्ष पर पहुंचता है, न ही किसी समाधान की दिशा में। लेकिन चिंता न करें, इस सब के बीच, हमें मिलते हैं कुछ ‘मनोरंजक’ मोमेंट्स भी, जब दो अनजान लोग एक-दूसरे को राजनीतिक ‘ज्ञान’ पिलाने के चक्कर में ऐसे उलझते हैं, मानो पुराने खोए हुए दोस्त हों।

तो अगली बार जब आप सोशल मीडिया पर राजनीतिक ‘दंगल’ देखें, तो याद रखिएगा कि ये सिर्फ एक ‘डिजिटल अखाड़ा’ है, जहां हर कोई अपनी-अपनी राजनीतिक कुश्ती लड़ रहा है। और हां, इस दंगल में विजेता कोई नहीं होता, सिवाय मनोरंजन के।

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